आज़ाद की रिहाई की मांग को लेकर पोस्टर जारी

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साठ से ज्यादा राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय संगठनों ने भीम आर्मी के नेता चंद्रशेखर आजाद की जेल से रिहाई की मांग करते हुए एक पोस्टर जारी किया है।

दलित समाज के अधिकारों के लिए हमेशा लड़ने के कारण चंद्रशेखर आज़ाद, जून, 2017 से ‘राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा’ मानकर जेल में डाल दिए गए हैं। भारत का दलित समाज जो लगातार जातिगत हिंसा, बलात्कार, अमानवीय छुआछूत की प्रथाओं, सामाजिक-सांस्कृतिक और राजनीतिक भेदभाव का शिकार रहा है। दलितों के ऊपर अत्याचार के अधिकतम क़ानूनी मामलों में अपराधियों को सज़ा न होने के चलते दलितों के पास न्याय-व्यवस्था द्वारा अपने अधिकारों की रक्षा मार्ग आसान नहीं होता।

अमेरिकी अश्वेतों के दूरदर्शी नेता मैल्कम X की तरह, चंद्रशेखर आज़ाद दलित अधिकारों के लिए लड़ने के ऐसे तरीके ईजाद कर रहे हैं जो न केवल रचनात्मक हैं परंतु प्रभावी भी हैं।

कथनी और करनी का फ़र्क मिटाते हुए चंद्रशेखर आज़ाद ने भारतीय संविधान निर्माता और देश के महानतम बुद्धिजीवी डॉ भीमराव अम्बेडकर के नाम पर ‘भीम आर्मी’ बनाकर दलितों को संगठित किया। ‘भीम आर्मी’ का मुख्य काम पश्चिमी उत्तर-प्रदेश में दलित छात्रों के बीच शिक्षा-प्रसार के लिए 300 स्टडी सर्कल की स्थापना और ऊँची जातियों के हमले के ख़िलाफ़ आत्म-रक्षात्मक ट्रेनिंग चलाना रहा है।

उत्तर प्रदेश के सहारनपुर ज़िले में दलितों और ऊँची जाति के राजपूतों में हुई झड़प में आज़ाद को ‘हिंसा के लिए उकसाने’ के जुर्म में गिरफ्तार किया गया। नवम्बर 2017 में इलाहाबाद मुख्य न्यायालय ने सभी चारों मामलों में यह कहते हुए उन्हें जमानत दे दी कि सभी मामले झूठे एवं राजनीतिक रूप से प्रेरित थे। पुलिस इस हिंसा में आज़ाद की किसी भूमिका का या फिर उनके पास हथियार होने का कोई भी सबूत नहीं दे सकी।

इसके बावजूद सरकार ने उन्हें पुनः राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम के अंतर्गत हिरासत में ले लिया। यह क़ानून सरकार को किसी को भी एक साल तक, बिना ज़मानत, जेल में रखने की अनुमति देता है। राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम, AFSPA तथा UAPA जैसे क़ानूनों में से है जो कि नागरिक अधिकारों का उल्लंघन करते हैं और भारतीय शासकों द्वारा, लोकतांत्रिक असंतोष को दबाने के लिए प्रयोग में लाये जाते हैं।

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